१०.
"प्रेम-ग्रंथ"
"तेरे दर्शन से, चंद्र किरण!
मेरे जलधर में, उठता ज्वार,
मेरी सलिला! ललचाता था,
तेरा वह सरसाता श्रृंगार,
थी चित्रगुप्त का चित्र तुम्हीं,
मेरे भविष्य का लेखा थी,
थी कला तुम्हीं, विज्ञान समूचा,
गद्य-पद्य अनदेखा थी,
धानी धरती, तुम धीर धार,
प्रिय! तुम सुगन्ध, संगीत-कर्ण,
तुम प्राणवायु, सुमधुर वाद्य,
तुम लहर-लहर, नव हरित पर्ण,
थी चपल उर्वशी, धवल मेनका
या रतिदेवी की प्रतिमा,
मृग-मरीचिका थी, सुंदर मरु की
या हरियाली हरीतिमा,
वे पलाश के पुष्प अधर थे
या दहके थे अंगारे,
थे कर्ण सुनहरे, चाँद के टुकड़े
या तारे प्यारे-प्यारे,
वह नैसर्गिक सौंदर्य अधर के,
याद मुझे शहतूत आ गए,
काली आँखें जामुन थीं बस
दृष्टि पड़ी, तुम मुझे भा गए,
तुम्हारे अधर, गुड़हली लाल,
उषा के रक्तकमल ज्यों ताल,
तुम्हारी दंत पंक्ति वह श्वेत,
मोती के दाने लगे प्रवाल,
कपोल कमल-दल थे, गुलाब
की पंखुड़ियाँ थीं, अधर,सुनो !
स्वर, तान बाँसुरी का तेरा, भाव-
भंगिमा भटकते भ्रमर, सुनो !
कटे सेब, तेरे कपोल,
उनकी लाली, मृदु भोर,
रससिक्त फाँक थे होंठ,
संतरे के मदमाते मौर,
पके टमाटर लाल गाल,
चुप्पी! मिर्ची सी तीखी थी,
ऐ प्राणसुधा! तू बता मुझे
यह लज्जा किससे सीखी थी?
मदिर कँपकँपी अधरों पर,
चुपके से कुछ-कुछ कहें नयन,
श्वेत सलोना मुख, प्रिय का,
लुटता था मेरा तन-मन-धन,
कौतुक! कपोल के काले तिल,
काले जादू का काम करें,
कलम काँपती है कवि की ,
रति-काम जहाँ संग्राम करें।"
(लगातार)
संजय कुमार शर्मा
"प्रेम-ग्रंथ"
"तेरे दर्शन से, चंद्र किरण!
मेरे जलधर में, उठता ज्वार,
मेरी सलिला! ललचाता था,
तेरा वह सरसाता श्रृंगार,
थी चित्रगुप्त का चित्र तुम्हीं,
मेरे भविष्य का लेखा थी,
थी कला तुम्हीं, विज्ञान समूचा,
गद्य-पद्य अनदेखा थी,
धानी धरती, तुम धीर धार,
प्रिय! तुम सुगन्ध, संगीत-कर्ण,
तुम प्राणवायु, सुमधुर वाद्य,
तुम लहर-लहर, नव हरित पर्ण,
थी चपल उर्वशी, धवल मेनका
या रतिदेवी की प्रतिमा,
मृग-मरीचिका थी, सुंदर मरु की
या हरियाली हरीतिमा,
वे पलाश के पुष्प अधर थे
या दहके थे अंगारे,
थे कर्ण सुनहरे, चाँद के टुकड़े
या तारे प्यारे-प्यारे,
वह नैसर्गिक सौंदर्य अधर के,
याद मुझे शहतूत आ गए,
काली आँखें जामुन थीं बस
दृष्टि पड़ी, तुम मुझे भा गए,
तुम्हारे अधर, गुड़हली लाल,
उषा के रक्तकमल ज्यों ताल,
तुम्हारी दंत पंक्ति वह श्वेत,
मोती के दाने लगे प्रवाल,
कपोल कमल-दल थे, गुलाब
की पंखुड़ियाँ थीं, अधर,सुनो !
स्वर, तान बाँसुरी का तेरा, भाव-
भंगिमा भटकते भ्रमर, सुनो !
कटे सेब, तेरे कपोल,
उनकी लाली, मृदु भोर,
रससिक्त फाँक थे होंठ,
संतरे के मदमाते मौर,
पके टमाटर लाल गाल,
चुप्पी! मिर्ची सी तीखी थी,
ऐ प्राणसुधा! तू बता मुझे
यह लज्जा किससे सीखी थी?
मदिर कँपकँपी अधरों पर,
चुपके से कुछ-कुछ कहें नयन,
श्वेत सलोना मुख, प्रिय का,
लुटता था मेरा तन-मन-धन,
कौतुक! कपोल के काले तिल,
काले जादू का काम करें,
कलम काँपती है कवि की ,
रति-काम जहाँ संग्राम करें।"
(लगातार)
संजय कुमार शर्मा

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