शनिवार, 12 अप्रैल 2014

९. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

९.
"प्रेम-ग्रंथ"

"बिंदिया,चूड़ी,कंगन,मेहँदी,
तेरा सोलह श्रृंगार,प्रिये!
पायल,झुमके,करधन,नथनी,
मेरे सपने साकार,प्रिये!

मुखड़े पर टेसू की लाली,
गालों पर रंग गुलाल तेरे,
भौंहें तेरी श्यामल रेखा,
वह केशराशि ज्यों व्याल तेरे,

मस्तक पर सोने का टीका,
अधरों पर गुड़हल की लाली,
वे कर्णफूल शशि सम लखते,
लज्जा तेरी सोलह वाली,

पैरों की उंगली में बिछिया,
वह घुँघरू की झनकार,प्रिये!
वह मीन देह सम पिंडलियाँ,
गल शोभित नौलख हार,प्रिये!

नैनों मे मेघों के काजल,
ठुड्डी पर मोहक काला तिल,
संपूर्ण देह जलधर पावक,
मधु-क्षीर मध्य लाली मिल-मिल,

वाणी तेरी सम देव-नाद,
कोयल का सुमधुर गीत लगे,
सखियों से वह रससिक्त वाद,
बजता स्वर्गिक संगीत लगे,

वह, तेरी बाहों के घेरे थे
स्वर्गों के सत्कार,प्रिये!
अब क्षण-क्षण तेरी अभिलाषा,
अब विरह नहीं स्वीकार,प्रिये!

वह अनामिका की रत्नजड़ित
मुद्रिका,शुक्र ! आकाश लगे,
वह हँसना तेरा,रति! मादक,
चहुँ ओर पुष्प मधुमास लगे,

बालों में गजरे का गुच्छा,
चंदन सुगंधि,चम्पा महका,
जल-जल जाता है जीव मेरा,
स्पर्श तेरा दहका-दहका,

कमर पर करधन बल खाता,
कसा अम्बर,मदमस्त इला,
तेरा यौवन वह मदमाता,
मेरा पूरा साम्राज्य हिला,

नाभि पर एक मोती दैदीप्य,
भोला सा हृदय मेरा खींचे,
तेरा वह मधुर हास जलवृष्टि,
मेरी सूखी धरती सींचे,

तुम मेरी तपस्या का प्रतिफल,
तुम मेरा योग,जप,ध्यान,प्रिये!
इस जीव जन्म का तुम संबल,
तुम मेरा शर-संधान,प्रिये!"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

८. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

८.
"प्रेम-ग्रंथ"

"जलती होलिका समक्ष शपथ,
है स्मृत वह होलिका दहन,
इस पार कान्त,उस पार प्रिया,
नयनों से करना हृद्अर्पण,

स्वर्ण सुमन वह सरसों के,
झूमे हिय गेहूँ की बाली,
पावक पलाश के पुष्प,दहकते
प्रिय के होठों की लाली,

उन नयनों से कुछ तीर चले,
कुछ लगे मुझे,कुछ उड़े गगन,
ईश्वर से क्या प्रेरणा मिली,
जब मुझे मिला,रति आमंत्रण,

बिन कहे कहा:'तुम कल आना
मेरी गलियों में रंग लिए,
जग आलोचित मत करे तुम्हें,
आना साथी कुछ संग लिए।',

गाली-झगड़ों में मत रहना,
मत पीना मदिरा-भंग,सुनो!
मर्यादित होली में रहना,
वह शूद्रों का है ढंग सुनो!

रंग-प्रीत-फाग का यह अवसर,
उत्सव है ढोल-नगाड़ों का,
मांदर की थाप सुनो,सजना!
नहीं दिन यह युद्ध अखाड़ों का,

हाँ सुनो!जब मेरी सखियाँ होंगी
साथ,निकट तुम मत आना,
पल-भर तकना एकान्त,
रंग मलना,मुझको मत तरसाना,

तुम जब निकलोगे गलियों से,
मैं छत से रंग उड़ेलूँगी,
जब मेरे रंग में रंगा तुम्हें
देखूँ,तब होली खेलूँगी,

और हाँ!तुम अपना रंग मेरी
ड्योढ़ी पर रखकर चल देना,
और वहीं रखा कुछ रंग मेरा
अपने मुखड़े पर मल देना,

कुछ रंग चुरा लेना मुझसे,
कुछ अपने रंग मुझे देना,
जाने भविष्य में क्या होगा,
पल भर का संग मुझे देना,

चलो आज फिर होली आई,
जाने तुम प्रियतमा! कहाँ...?
यदि शेष प्रेम किंचित मुझसे,
रंगना मेरा प्रतिबिम्ब वहाँ..?

हा!प्रियतम सब याद मुझे है,
रंग,मेरे सर्वाँग,सुनो!
नियति नटी के हाथों में हा!
जीवन मेरा स्वांग सुनो।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

७. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण


७.
"प्रेम-ग्रंथ"

"भादो का वह शुक्ल-चंद्र, जब 

कृष्ण घटाओं में से जागा,
कारावासित हृदय-मीन, जल 

देखा और निकल कर भागा,

ज्येष्ठ मास में सूर्य रश्मि सा,
तेज भरा तेरा यौवन था,
सूचक था घनघोर वृष्टि का,
जलता मानों तन-मन था,

सिर केश मध्य सिन्दूर रक्त और 

माथे पर प्यारी बिन्दिया,
हृदकोकिल मानों उन्मत होकर,
करने लगी कुहुक, निंदिया !

पूर्णचंद्र था भाल सुशोभित,
नयन मद भरे कजरारे,
दिवा भानु दैदीप्य प्रज्जवलित,
देख निशाचर तम हारे,

खुले केश लहराते थे ज्यों
जलधर बरसे, जलधर पर,
दृष्टि दिग्भ्रमित हुई, श्याम 

रंग अम्बर था श्वेत अम्बर पर,

सुन! तेरे माथे की बिन्दिया,
चंद्रमा है, भाल अम्बर,
तेरी भृकुटि हैं धनुष,और
प्रियतमा! तू रति धनुर्धर,

चंचल तेरे नेत्र कदाचित
मुझ पर ही तो टिकते थे,
मुझमें सिमटे अनमोल धरोहर,
तुझ पर ही तो बिकते थे,

भौंहें सघन कमान,
नेत्र मृगनयनी दर्पण,
सरस अधर सुंदर मुखड़े पर
सब कुछ अर्पण,

माया तेरी मुस्कान !
ग्रीष्म में शीत बरसता,
नवल निरंकुश नैन,
जलधि गंभीर गरजता,

स्वर्ग सा सौंदर्य भोला,
देखकर साम्राज्य डोला,
मोरनी सी चाल,जैसे
हंस को न्यौता अबोला !

मुख शोभित थे रक्त स्फटिक
या मोती! दाड़िम के दाने,
तेरी समीपता कामसूत्र
मानों रति आई समझाने,

उन्नत ललाट पर कुमकुम की
बिन्दी,अम्बर पर दिनकर,
मुखड़ा तेरा सुधा सिक्त,
सर्वस्व समर्पण तत्पर।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

६. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण


६.
"प्रेम-ग्रंथ"

"वह कामोद्दीपक नवयौवन,
मैं कामातुर, पथराती सोच,
कसी डोरी से बँधा हृदय,
करें हतप्रभ नितम्ब के लोच,

मनमोहक, मादक पर्वत!
करते जाते थे नृत्य,
जिन्हें देख मैं विवश !
काम का बनता जाता भृत्य,

गौर-वर्ण, माँसल शरीर,
आमंत्रण तन-मन-धन का,
मैं आंदोलित हो गया,मिला
जब मुक्त निमंत्रण यौवन का,

कँपते तेरे उत्तुंग शिखर,
हुआ था जब कटाक्ष संघर्ष,
जल-जल लज्जा से हुई,
प्रतीक्षित हुए मेरे स्पर्श,

पृष्ठ अवतल, सुगठित देह,
मुखड़े पर लज्जा की लाली,
चित्त स्थिर तुम वर्ण मेरा
और प्राण, अप्सरा मतवाली,

कोटि सूर्य अगणित किरणों से
चन्द्रबदन वह दमक रहा था,
दीप्त-दामिनी दीन हुई,
मुखचन्द्र तुम्हारा चमक रहा था,

तुम्हारी सुन्दरता सम्पूर्ण,
मुझे करती थी आल्हादित,
भागा हर अंधकार डर कर,
तेरा मुखमंगल जब प्रस्फुटित,

प्रथम वृष्टि सी देहयष्टि,
व्यक्तित्व चाँदनी शीत लपेटे,
शुष्क इला मधुरस बूँदों से,
श्रंगारित सौंदर्य समेटे,

सावन की हरियाली थी,
तुम भादो की काली रातें,
कौन पुरुष उत्तेजित न हो,
सुनकर प्यार भरी बातें,

ऋतुराज शीत में श्वाँस तेरे,
शीतोष्ण तपन बरसाते थे,
शरद-पूर्णिमा, चंद्र-ज्योत्सना,
हृदय-कुसुम हरषाते थे,

तुम वसन्त में आम्रमौर थी,
पिकवाणी थी रस घोले,
आग्रह तेरा अतिरिक्त मधुर,
सुन जिसको मन डगमग डोले,

अचम्भित हुए मेरे दृग-पलक,
प्रकम्पित लुप्त तुम्हारी झलक,
आँचल छिन चढ़े, दिखे छिन ढलक,
छवि से अनवरत, रस रहा छलक।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

५. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण


५.
"प्रेम-ग्रंथ"

"नारी चुंबक, पौरुष वैद्युत,
जब प्रेम कहीं वह पाता है,
आकर्षण प्रकृति का मूल नियम,
मन अनायास खिंच जाता है,

जीवन का संगीत तुम्हीं,
तुमसे फूटे थे मधुर तान,
हृद-हाटक हिल्लोरित जब
तुमने फूँके निःशब्द बाण,

शुभ्र-संदली-सहृदय-सीधी,
सीपी में मोती सुन्दर,
बाहर से दैदीप्यमान वह,
स्वर्ण सुनहरी रति अन्दर,

सावन-भादो में गोरी !
तुम गौरी मुझे लुभाती थी,
भोले-भाले नट शिव को,
तुम नटखट नाच नचाती थी,

मुझमें तुम थी श्लेष, प्रियतमा!
यमक मेरा आलिंगन था,
अनुप्रास अनगिनत आलिंगन,
हंस उपमा तेरा तन था,

मैं परिधि पर द्रव्यमान,
तुम केन्द्र दिशा अभिकेन्द्र त्वरण,
तेरे परितः गति संकल्पित
और तेरे बिन गंतव्य मरण,

मुझे लालसा उत्कट,
तुमसे मिलने को ललचाती थी,
मंदिर की घंटी भी तब
पग-पायल सी भरमाती थी,

छँटे बादल, छाए उल्लास,
लगे उजियार, दस दिशा व्याप्त,
आगमित होते ही मधुमास,
भामिनी संग सारे सुख प्राप्त,

पदचाप तुम्हारा सुनते ही
तब रक्त प्रवाहन बढ़ता था,
विकट प्रतीक्षा तब प्रतीत,
प्रियतमा-मूर्ति जब गढ़ता था,

मैं नौका तुम पतवार,प्रियतमा!
मैं दीपक,  तुम बाती,
नव उत्तेजन प्रारंभ मेरा,
पढ़ते ही तेरी पाती,

प्रियतमा मेरी, प्रतिबिम्ब रति,
अल्हड़ यौवन, पर कोमल तन,
चंचल दृग, सुन्दर आकृति,
वह कृष्ण केश, चंदन चितवन,

छम-छम पायल की मधुर ध्वनि,
खन-खन कंगन के स्वर्ग-खनक,
सुन-सुन संगीत परम का सत्,
रुन-झुन करधन से कमर-लचक।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

४. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

४.
"प्रेम-ग्रंथ"

"चेहरे पर था रंग गुलाबी,
वह अक्षत यौवन थी,
पर पीड़ा पर मैं तड़पा था
ज्यों वह मेरा तन थी,

कब बढ़े नीर अनुपात? भले ही
जलधर, जलधर पर बरसे,
प्रतिपल प्रेरित प्रणय, प्रियतमा!
प्यासा पानी 
पी कर तरसे,

नयन, नयन से मिले नहीं कि
प्रथम दृष्टि में प्यार हो गया,
अब तक जिसे सहेज रखा था,
हृदय न जाने कहाँ खो गया,

दत्तचित्त दुर्भेद्य दुर्ग को
दीर्घबाहु, तुमने भेदा,
मैं लौहपुरुष, मुझको लिप्सा
से लिप्त तीर ने छेदा,

एक हवा का निर्दय झोंका,
अस्त्र लिए, मुझ पर दौड़ा,
मन तुरंग पर, शस्त्र सुसज्जित,
मुझ पर चला रहा कोड़ा,

हृस्व हृदय, हय सदृश हो गया,
करने लगा हवा से बातें,
हुई कनपटी लाल,जम गया
रक्त निकट जाते जाते,

उंची-नीची, लयबद्ध ताल,
सौंदर्य भार से चढ़ा हुआ,
मैं ढीठ नहीं था फिर भी क्यों?
आँखें गाड़े बस अड़ा हुआ,

उषा किरण की लाली थी तुम,
जो पूरब में व्याप्त भोर से,
या आभा जो शुक्र समेटे,
सांध्य उगे पश्चिमी छोर से,

तुम पूर्ण चंद्र, प्रज्जवलित सूर्य,
तुम अंतरिक्ष तारामंडल,
दृष्टि मिली मन खिले,प्रिये!
यह जीवन मेरा हुआ मंगल,

अंगड़ाई तुम अलसाई 
सी,
अनबूझ अंतरा अनजाना,
अनकही, अपरिमित आस जगाती
तुम अमूल्य ताना-बाना,

तेरी परिधि में सिमट गया,
मेरे जीवन का वृत्त,
तुम केन्द्र बिन्दु बन गई मेरी,
गतिमान हो गया चित्त,

पत्र लिख कर, पत्र पर,
तुमने दिया था एक दिन,
कह दिया था मूक नेत्रों से
समर्पण! कुछ कहे बिन।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

३. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण


३.
"प्रेम-ग्रंथ"

"प्रेम-पाश थे मूक नयन,
सब कह देते थे,
आमंत्रण वे,प्रणयसिक्त
कलरव देते थे,

मधुकलश सरीखे चलती थी,
वह सोमरसों को लगे लजाती,
एक सुगंध का झोंका थी
वह जब-जब आती,

कौन!हाँकता,मेरे मन को,
ले जाता किस ओर रे,
श्याम-सलोनी,साँवल गोरी
थी,मेरी चितचोर रे,

जब हँसती थी वह मधुबन थी,
कुछ कहती थी तो अमृत था,
थी किसी जन्म का पुण्य कदाचित,
सोच-सोच मैं विस्मित था,

कंगन की थी मधुर खनक,
उसकी कोयल सी बोली थी,
वही दीवाली मेरे सुखों की,
मेरे दुखों की होली थी,

बादलों की कालिमा
उसके लरजते केश थे,
बंद किन्तु कँपकँपाते
होठ में संदेश थे,

नासिका उत्कृष्ट थी,
अप्रतिम नयन गंभीर थे,
मोतियों की दंतपंक्ति
सम मचलते क्षीर थे,

गुलाबी पंखुड़ियों सम होठ,
खिले जो प्रातः लाल कली
आमंत्रित करते वे लरज-लरज,
रसीली ज्यों अंगूर फली,

वाणी में सुमधुर हास समेटे,
चाल हंस की भाँति लगी,
झर-झर करता झरना थी वह
कल्पवृक्ष की काँति लगी,

स्फूर्त चेतना मेरी थी,
नवयौवन की अंगड़ाई थी,
नव-प्रभात की पावन वेला
थी,संध्या अलसाई थी,

था चित्त मेरा तब ब्रह्मलीन,
प्रियतमा!मुझे तुम भाती थी,
एक हवा के झोंके से जब
चुनरी उड़-उड़ जाती थी,

शैशविक सौंदर्य था और
बाल्यक्रीड़ा थी चपलता,
प्रौढ़ सी विकसित मना थी
पर युवा मन कब संभलता?"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

२. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

२.
"प्रेम-ग्रंथ"

"सोते-जगते, हँसते-गाते, सब
ओर लगी तुम व्याप्त मुझे,
और नहीं कुछ मुझे चाहिए,
प्रेम-दृष्टि पर्याप्त मुझे,

जीवन को झंकृत करती थी,
चेष्टा वह, मादक अठखेली,
मधुशाला की मदभरी तान,
तुम आतुर, अल्हड़, अलबेली,

पलक झपकते ही बदला
मानों प्रकृति ने वेश,
मुखचंद्र चांदनी पर चपला
से चमक उठे थे केश,

वह निहारना, तेरा मुझे,

छिप कर अपलक, आनंदित दृग,
मुझसे दृष्टि मिल जाते ही,
चेहरे पर खिलता, भटका मृग,

तुम प्रकटी सम्मुख प्रथम बार
ज्यों प्रकट हुई थी माया,
उल्लास नयन में, प्रेम हृदय
में, प्रथम बार था छाया,

आकर्षण तेरा वह उन्मुक्त,
निमंत्रण देता मुझको मौन,
निशा-निस्तब्ध-चपल-कम्पित,
मधुर संगीत बजाता कौन?

तपन तपाती मुझ धरती को,
शीतल तुमने किया मुझे,
प्रेमसिक्त पग धरा धरा पर,
मोक्ष प्यार का दिया मुझे,

मैं विस्मित था, तुम चुपके-
चुपके कदम बढ़ाती चली गई,
मुझ निरे निरक्षर से नर को
तुम प्रेम पढ़ाती चली गई,

प्रणय का संदेश था या
पायलों की वह छनक थी,
आमंत्रण था मूक चुप में,
हर लहर कंगन खनक थी,

मौन कह देता था सब कुछ,
कौंधती बिजली चमकती,
रस से भीगा था मेरा मन,
दृष्टि में जब तुम दमकती,

वह तेरा मुझको कहना,
तुम मेरी थी, वह बचपन था,
चंचल मन, उद्विग्न आचरण-
युक्त तेरा वह यौवन था,

चीर जामुनी चीर, चमक चिर-
शुक्ल चंद्र ज्यों उदित हुआ,
मस्त, मदिर, मादक मलयानिल,
मन मनसिज मेरा मुदित हुआ,

तुमको छूकर, शीतोष्ण लहर
जो मेरे तन तक आती थी,
मेरा मन नागिन नृत्य करे,
चंदन सुगन्ध वह लाती थी।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा



१. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

१.
"प्रेम-ग्रंथ"

"मैं था अल्हड़ एक नवयुवक,
श्वाँसें मेरी तरंगित थीं,
अकथ भावना प्रेमगीत की,
मेरे लिये अपरिचित थी,

रहता था अपनी धुन में,
जागा-जागा, खोया-खोया,
दुर्गम प्रेम मार्ग भयातुर,
भागा-भागा, सोया-सोया,

अनगढ़ सी तुम,अल्हड़ थी तुम,
अकस्मात आगमित हुई,
जड़ जगत जला, जागा चेतन,
जब जादू तुम अवतरित हुई,

तुम कौन ? प्रश्न का उत्तर
था, तब मेरे मन में जागा,
मैं नौका तुम पतवार,
सुनहरा स्वर्ण संयोग सुहागा,

कदली कला, चमकती ग्रीवा,
कंधों पर यौवन का भार,
मैं क्या रहा, हुई तुम सब कुछ,
तू ही था मेरा संसार,

तो मैं किशोर जिज्ञासु हो गया,
वयःसंधि की क्रीड़ा का,
पर अनुमान मुझे कब था,
अल्पवय प्रेम की पीड़ा का।

धवल नयन, उत्कृष्ट नासिका,
अधर मद भरे मधुकलश,
प्रियतम का सौंदर्य कदाचित,
करता जाता था परवश,

मृदुल लता सी देहयष्टि,
तम को झंकृत करता निःश्वास,
कम्पित पलाश के अधर जगाते थे,
अंतस मधुरिम विश्वास,

घटा घनघोर, काले केश
उड़ते थे, 
पवन के जोर से,
मलयानिल से सिक्त नागिन
नृत्य करती भोर से,

प्रेम की साक्षात देवी,
काम का धनु कटि प्रदेश,
वक्षस्थल सागर समुन्नत,
नैन कहते थे संदेश,

रति मूल प्रकृति तुम लज्जा थी,
मानों पुष्पों से बनी हुई,
निष्पाप नयन की प्रत्यंचा,
कामुक कमान सी तनी हुई,

अपरिमित आकर्षण अंजान!
लिये जाता था तेरी ऒर,
हवा में अश्व उड़े था ज्यों,
खिंचा जाता था मैं बिन डोर।

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

"प्रेमग्रंथ...मंगलाचरण"

मंगलाचरण

"श्री श्री पशुपतिनाथ वंदन"

"जय जय हो! भोलेनाथ तुम्हारी,
तुम हो घट-घट वासी,
तुम योगी हो, महातपी हो,
जय जय हो! औघड़ सन्यासी,

हो त्रिनेत्र तुम, प्रथम नेत्र से
सृष्टि करो, मन मैल धुले,
द्वितीय चक्षु से वरदाता,
संहारक! दृग जब तृतीय खुले,

विश्वेश्वर! व्याल, विशेष तुम्हें प्रिय,
विश्व-विषय विष स्वयं समेटा,
हे नीलकंठ! नटराज नृत्य कर,
नागराज को गले लपेटा,

रक्षार्थ जगत, हे उमा महेश्वर!
रत्न हलाहल पान किया,
हे भूतनाथ! तुम काम विजेता,
कर्म-योग-तप-ध्यान दिया,

तुम प्राणवायु, तुम जल-थल-नभ,
नाड़ी-अस्थि-रुधिर तुम हो,
तुम ज्ञानेन्द्रिय, तुम कर्मेन्द्रिय,
षष्ठेन्द्रिय! मंत्र मदिर तुम हो,

तुम रुधिर गति, तुम बुद्धि मति,
तुम आज प्राण, तुम कल प्रयाण,
तुम जन्म मेरे, तुम हृद्कम्पन,
तुम साक्ष्य जीव, तुम सत प्रमाण,

हे भूतेश्वर! तुम आदि-भूत,
भविष्य-अंत, तुम वर्तमान,
तुम कर्मयोग, तुम ध्यानजोग,
तुम विषयभोग, तुम वर्धमान,

निर्गुण अल्लाह, सगुण जीसस,
तुम ऋषभदेव, तुम जय जिनेन्द्र,
तुम धर्म इन्द्र, तुम कामदेव,
इच्छा मेरी तुम, जय जितेन्द्र,

जय जय त्रिदेव! तुम इष्ट देव,
तुम दयावान, तुम क्षमाशील,
तुम बिल्बपत्र, चंदन सुगंध
सागर समीर, तुम मलयानिल,

हे पशुपति! तुम नेत्र मेरे,
तुम जिह्वा, तुम वाणी हो,
मरघटवासी तुम, मुनि तपस्वी,
भूमि तुम्हीं, तुम पानी हो,

तुम स्वयं समय, स्थिति तुम्हीं,
गतिमान समुद्र प्रवाल तुम्हीं हो,
तुम जन्म-वृद्धि, तुम जरा-मृत्यु,
हो कापालिक शिव, काल तुम्हीं हो,

तुम कण-कण में शंभू! भूतागत,
तुम वर्तमान के समय प्रणेता,
क्षण-क्षण, युग-युग पशुपति प्रवाहित,
कलियुग-द्वापर-सतयुग-त्रेता,

तुम उत्तर हो, तुम दक्षिण हो,
तुम पूरब-पश्चिम के स्वामी,
नक्षत्र, चंद्र, तारे अपार,
प्रभु कोटि सूर्य, तुम अविरामी,

हे मृत्युन्जय! तुम्हें सुमिर कर
कलम गह लिया हाथ,
हर-हर त्रिपुरारी महादेव!
हर क्षण तुम रहना साथ,

हे कृपानिधि!  कवि-कलम कृपा,
यह प्रेम ग्रंथ मैं गढ़ता हूँ,
तुमने ही संजय नियति लिखी,
वह पत्र,आज मैं पढ़ता हूँ।"

प्रेमग्रंथ - संजय कुमार शर्मा