रविवार, 6 जुलाई 2014

१२. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

                                   

१२.
"प्रेम-ग्रंथ"

"वे तेरे चंचल नयन, हृद्-
ताल पर पंकज सरस थे,
रक्त लाली अधर रस की,
तृप्त करते मधुकलश थे,

हंस कूज, भौंरे की गुंजन,
कोयल कू-कू तेरी बोली,
कभी शुभ्र तुम नीमपुष्प तो 
कभी रसभरी मधुर निंबोली,

ग्रीवा की सुंदरता उत्कृष्ट,
झूलता प्रियहिय तक गलहार,
लूटता प्रलयतुल्य कटिलोच,
नृत्यरत नव नितम्ब रतनार,

कोकिलकंठा थी, हंस देह से,
सिंह कटि से थी कामधेनु तुम,
नयन मृगी के, चाल हस्तिनी,
वनबाला थी कामरेणु तुम,

सुशोभित देह,स्वर्ण श्रृंगार,
जिनका विस्तार भार पर भार,
सुमन तुम सकुचाई सुकुमार,
श्वाँसों में सिमट रहा संसार,

मुखड़ा पय का अभिसार व्योम
तक, धैर्य अपूर्व झलकता था,
सुरसरि शशि सौंदर्य उष्ण से 
प्रातः, ओस छलकता था,

चंदन सुगन्ध वह देहराशि,
सिन्दूर अधर आलता लाल,
टीका-कुमकुम-बिंदिया-काजल,
उन्मुक्त केश थे क्रुद्ध व्याल,

पयमुख विराट अनुहार उर्ध्व,
दक्षिण ढलते घनश्याम केश,
पूरब-पश्चिम द्विज चंद्र कर्ण,
उत्तर दिनकर ने धरा भेष,

घूँघट के पट खुले, अभ्र पर 
आभासित अनगिनत दामिनी,
सुरपति मोहित, उर्वशी नृत्यरत,
उद्भासित उद्दाम कामिनी,

गुलाबी-लाल हथेली थी,
जिनका स्पर्श मात्र, प्रिय ध्येय,
कहाँ से लाउँ मैं उपमान,
ऐसी तुम सर्वोत्तम उपमेय,

तुम्हारा अव्याख्येय सौंदर्य,
रति का तुम अतिरंजित प्रतिमान,
तुम्हारा शील स्वर्ग उपहार,
नारी का तुम समग्र सम्मान,

तुम मित्र मेरी हो मित्र, साँध्य-
वेला की सी तुम  रक्तिम हो,
तुम मेरे काव्य की पंक्ति प्रथम,
तुम मेरी लेखनी अंतिम हो।।"

(लगातार)  

संजय कुमार शर्मा  

मंगलवार, 24 जून 2014

११. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण



११.
"प्रेम-ग्रंथ"

"चंचलता और होली का
कैसा गहरा संबंध,
जीवन का जीवन से मानों
रंग भरा अनुबंध,

होली में मिटे बैर-झगड़े,
होली में रंगों की बौछार,
होली में मिले हृदय से हृदय,
होली है, रंगों का त्यौहार,

होलिका दहन से मिले प्रेरणा,
सत्य सदा जीता करता,
और असत्य, सत् की ज्वाला में
रात्रि पहर, तिल-तिल मरता,

प्रखर सत्य तब स्वर्ण निकलता
तप कर होली की ज्वाला से,
हर्षनाद गुम्फित अनुनादित,
नव-वसंत फागुन हाला से,

मन को मादक, मुदित करे
अब वही फागुनी हाला,
मन-मदन मानता कैसे जब,
सम्मुख अर्पित मधुबाला,

लज्जा से झुकी-झुकी आँखें,
रति-पीड़ा से कम्पित तन-मन,
वर्षा की प्रत्याशा से धरती का
अक्षुण्ण हर्षित यौवन,

होली में सफल प्रेम अभिव्यक्ति,
होली में प्रियतम का अभिसार,
होली में भ्रमर-पुष्प मिलते,
होली में मदन-मीत मनुहार,

देखो! दसों दिशाओं में,वह
रंग, गुलाल, अबीर उड़ रहा,
मिले सभी रंग, श्वेत! शाँति खग,
धन से ऋण स्वयमेव जुड़ रहा,

रंगों पर रंग चढ़े इतने,
सब मुखड़े एक समान हुए,
गढ़ते सब नैनों की भाषा,
पिचकारी तीर-कमान हुए,

पढ़ ले जो नैनों की भाषा,
सुन ले,सब कुछ जो बिना कहे,
सुन संजय!प्रेमी इस जग में
पाए कैसे कुछ! बिना सहे,

होली में रंग किससे खेलूँ,
मेरा रंग उड़ता और कहीं,
संग्राम पराजित सैनिक को,
जग में नहीं मिलता ठौर कहीं,

शिव-शक्ति नृत्यरत, दिक्-दिगन्त,
ब्रज में राधे-राधे बंशी,
रति-काम मोहते मद-मन को,
त्रेता मर्यादित रघुवंशी।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

रविवार, 22 जून 2014

१०. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

१०.
"प्रेम-ग्रंथ"

"तेरे दर्शन से, चंद्र किरण!
मेरे जलधर में, उठता ज्वार,
मेरी सलिला! ललचाता था,
तेरा वह सरसाता श्रृंगार,

थी चित्रगुप्त का चित्र तुम्हीं,
मेरे भविष्य का लेखा थी,
थी कला तुम्हीं, विज्ञान समूचा,
गद्य-पद्य अनदेखा थी,

धानी धरती, तुम धीर धार,
प्रिय! तुम सुगन्ध, संगीत-कर्ण,
तुम प्राणवायु, सुमधुर वाद्य,
तुम लहर-लहर, नव हरित पर्ण,

थी चपल उर्वशी, धवल मेनका
या रतिदेवी की प्रतिमा,
मृग-मरीचिका थी, सुंदर मरु की
या हरियाली हरीतिमा,

वे पलाश के पुष्प अधर थे
या दहके थे अंगारे,
थे कर्ण सुनहरे, चाँद के टुकड़े
या तारे प्यारे-प्यारे,

वह नैसर्गिक सौंदर्य अधर के,
याद मुझे शहतूत आ गए,
काली आँखें जामुन थीं बस
दृष्टि पड़ी, तुम मुझे भा गए,

तुम्हारे अधर, गुड़हली लाल,
उषा के रक्तकमल ज्यों ताल,
तुम्हारी दंत पंक्ति वह श्वेत,
मोती के दाने लगे प्रवाल,

कपोल कमल-दल थे, गुलाब
की पंखुड़ियाँ थीं, अधर,सुनो !
स्वर, तान बाँसुरी का तेरा, भाव-
भंगिमा भटकते भ्रमर, सुनो !

कटे सेब, तेरे कपोल,
उनकी लाली, मृदु भोर,
रससिक्त फाँक थे होंठ,
संतरे के मदमाते मौर,

पके टमाटर लाल गाल,
चुप्पी! मिर्ची सी तीखी थी,
ऐ प्राणसुधा! तू बता मुझे
यह लज्जा किससे सीखी थी?

मदिर कँपकँपी अधरों पर,
चुपके से कुछ-कुछ कहें नयन,
श्वेत सलोना मुख, प्रिय का,
लुटता था मेरा तन-मन-धन,

कौतुक! कपोल के काले तिल,
काले जादू का काम करें,
कलम काँपती है कवि की ,
रति-काम जहाँ संग्राम करें।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

९. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

९.
"प्रेम-ग्रंथ"

"बिंदिया,चूड़ी,कंगन,मेहँदी,
तेरा सोलह श्रृंगार,प्रिये!
पायल,झुमके,करधन,नथनी,
मेरे सपने साकार,प्रिये!

मुखड़े पर टेसू की लाली,
गालों पर रंग गुलाल तेरे,
भौंहें तेरी श्यामल रेखा,
वह केशराशि ज्यों व्याल तेरे,

मस्तक पर सोने का टीका,
अधरों पर गुड़हल की लाली,
वे कर्णफूल शशि सम लखते,
लज्जा तेरी सोलह वाली,

पैरों की उंगली में बिछिया,
वह घुँघरू की झनकार,प्रिये!
वह मीन देह सम पिंडलियाँ,
गल शोभित नौलख हार,प्रिये!

नैनों मे मेघों के काजल,
ठुड्डी पर मोहक काला तिल,
संपूर्ण देह जलधर पावक,
मधु-क्षीर मध्य लाली मिल-मिल,

वाणी तेरी सम देव-नाद,
कोयल का सुमधुर गीत लगे,
सखियों से वह रससिक्त वाद,
बजता स्वर्गिक संगीत लगे,

वह, तेरी बाहों के घेरे थे
स्वर्गों के सत्कार,प्रिये!
अब क्षण-क्षण तेरी अभिलाषा,
अब विरह नहीं स्वीकार,प्रिये!

वह अनामिका की रत्नजड़ित
मुद्रिका,शुक्र ! आकाश लगे,
वह हँसना तेरा,रति! मादक,
चहुँ ओर पुष्प मधुमास लगे,

बालों में गजरे का गुच्छा,
चंदन सुगंधि,चम्पा महका,
जल-जल जाता है जीव मेरा,
स्पर्श तेरा दहका-दहका,

कमर पर करधन बल खाता,
कसा अम्बर,मदमस्त इला,
तेरा यौवन वह मदमाता,
मेरा पूरा साम्राज्य हिला,

नाभि पर एक मोती दैदीप्य,
भोला सा हृदय मेरा खींचे,
तेरा वह मधुर हास जलवृष्टि,
मेरी सूखी धरती सींचे,

तुम मेरी तपस्या का प्रतिफल,
तुम मेरा योग,जप,ध्यान,प्रिये!
इस जीव जन्म का तुम संबल,
तुम मेरा शर-संधान,प्रिये!"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

८. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण

८.
"प्रेम-ग्रंथ"

"जलती होलिका समक्ष शपथ,
है स्मृत वह होलिका दहन,
इस पार कान्त,उस पार प्रिया,
नयनों से करना हृद्अर्पण,

स्वर्ण सुमन वह सरसों के,
झूमे हिय गेहूँ की बाली,
पावक पलाश के पुष्प,दहकते
प्रिय के होठों की लाली,

उन नयनों से कुछ तीर चले,
कुछ लगे मुझे,कुछ उड़े गगन,
ईश्वर से क्या प्रेरणा मिली,
जब मुझे मिला,रति आमंत्रण,

बिन कहे कहा:'तुम कल आना
मेरी गलियों में रंग लिए,
जग आलोचित मत करे तुम्हें,
आना साथी कुछ संग लिए।',

गाली-झगड़ों में मत रहना,
मत पीना मदिरा-भंग,सुनो!
मर्यादित होली में रहना,
वह शूद्रों का है ढंग सुनो!

रंग-प्रीत-फाग का यह अवसर,
उत्सव है ढोल-नगाड़ों का,
मांदर की थाप सुनो,सजना!
नहीं दिन यह युद्ध अखाड़ों का,

हाँ सुनो!जब मेरी सखियाँ होंगी
साथ,निकट तुम मत आना,
पल-भर तकना एकान्त,
रंग मलना,मुझको मत तरसाना,

तुम जब निकलोगे गलियों से,
मैं छत से रंग उड़ेलूँगी,
जब मेरे रंग में रंगा तुम्हें
देखूँ,तब होली खेलूँगी,

और हाँ!तुम अपना रंग मेरी
ड्योढ़ी पर रखकर चल देना,
और वहीं रखा कुछ रंग मेरा
अपने मुखड़े पर मल देना,

कुछ रंग चुरा लेना मुझसे,
कुछ अपने रंग मुझे देना,
जाने भविष्य में क्या होगा,
पल भर का संग मुझे देना,

चलो आज फिर होली आई,
जाने तुम प्रियतमा! कहाँ...?
यदि शेष प्रेम किंचित मुझसे,
रंगना मेरा प्रतिबिम्ब वहाँ..?

हा!प्रियतम सब याद मुझे है,
रंग,मेरे सर्वाँग,सुनो!
नियति नटी के हाथों में हा!
जीवन मेरा स्वांग सुनो।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

७. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण


७.
"प्रेम-ग्रंथ"

"भादो का वह शुक्ल-चंद्र, जब 

कृष्ण घटाओं में से जागा,
कारावासित हृदय-मीन, जल 

देखा और निकल कर भागा,

ज्येष्ठ मास में सूर्य रश्मि सा,
तेज भरा तेरा यौवन था,
सूचक था घनघोर वृष्टि का,
जलता मानों तन-मन था,

सिर केश मध्य सिन्दूर रक्त और 

माथे पर प्यारी बिन्दिया,
हृदकोकिल मानों उन्मत होकर,
करने लगी कुहुक, निंदिया !

पूर्णचंद्र था भाल सुशोभित,
नयन मद भरे कजरारे,
दिवा भानु दैदीप्य प्रज्जवलित,
देख निशाचर तम हारे,

खुले केश लहराते थे ज्यों
जलधर बरसे, जलधर पर,
दृष्टि दिग्भ्रमित हुई, श्याम 

रंग अम्बर था श्वेत अम्बर पर,

सुन! तेरे माथे की बिन्दिया,
चंद्रमा है, भाल अम्बर,
तेरी भृकुटि हैं धनुष,और
प्रियतमा! तू रति धनुर्धर,

चंचल तेरे नेत्र कदाचित
मुझ पर ही तो टिकते थे,
मुझमें सिमटे अनमोल धरोहर,
तुझ पर ही तो बिकते थे,

भौंहें सघन कमान,
नेत्र मृगनयनी दर्पण,
सरस अधर सुंदर मुखड़े पर
सब कुछ अर्पण,

माया तेरी मुस्कान !
ग्रीष्म में शीत बरसता,
नवल निरंकुश नैन,
जलधि गंभीर गरजता,

स्वर्ग सा सौंदर्य भोला,
देखकर साम्राज्य डोला,
मोरनी सी चाल,जैसे
हंस को न्यौता अबोला !

मुख शोभित थे रक्त स्फटिक
या मोती! दाड़िम के दाने,
तेरी समीपता कामसूत्र
मानों रति आई समझाने,

उन्नत ललाट पर कुमकुम की
बिन्दी,अम्बर पर दिनकर,
मुखड़ा तेरा सुधा सिक्त,
सर्वस्व समर्पण तत्पर।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा

६. "प्रेम-ग्रंथ" आकर्षण-आमंत्रण


६.
"प्रेम-ग्रंथ"

"वह कामोद्दीपक नवयौवन,
मैं कामातुर, पथराती सोच,
कसी डोरी से बँधा हृदय,
करें हतप्रभ नितम्ब के लोच,

मनमोहक, मादक पर्वत!
करते जाते थे नृत्य,
जिन्हें देख मैं विवश !
काम का बनता जाता भृत्य,

गौर-वर्ण, माँसल शरीर,
आमंत्रण तन-मन-धन का,
मैं आंदोलित हो गया,मिला
जब मुक्त निमंत्रण यौवन का,

कँपते तेरे उत्तुंग शिखर,
हुआ था जब कटाक्ष संघर्ष,
जल-जल लज्जा से हुई,
प्रतीक्षित हुए मेरे स्पर्श,

पृष्ठ अवतल, सुगठित देह,
मुखड़े पर लज्जा की लाली,
चित्त स्थिर तुम वर्ण मेरा
और प्राण, अप्सरा मतवाली,

कोटि सूर्य अगणित किरणों से
चन्द्रबदन वह दमक रहा था,
दीप्त-दामिनी दीन हुई,
मुखचन्द्र तुम्हारा चमक रहा था,

तुम्हारी सुन्दरता सम्पूर्ण,
मुझे करती थी आल्हादित,
भागा हर अंधकार डर कर,
तेरा मुखमंगल जब प्रस्फुटित,

प्रथम वृष्टि सी देहयष्टि,
व्यक्तित्व चाँदनी शीत लपेटे,
शुष्क इला मधुरस बूँदों से,
श्रंगारित सौंदर्य समेटे,

सावन की हरियाली थी,
तुम भादो की काली रातें,
कौन पुरुष उत्तेजित न हो,
सुनकर प्यार भरी बातें,

ऋतुराज शीत में श्वाँस तेरे,
शीतोष्ण तपन बरसाते थे,
शरद-पूर्णिमा, चंद्र-ज्योत्सना,
हृदय-कुसुम हरषाते थे,

तुम वसन्त में आम्रमौर थी,
पिकवाणी थी रस घोले,
आग्रह तेरा अतिरिक्त मधुर,
सुन जिसको मन डगमग डोले,

अचम्भित हुए मेरे दृग-पलक,
प्रकम्पित लुप्त तुम्हारी झलक,
आँचल छिन चढ़े, दिखे छिन ढलक,
छवि से अनवरत, रस रहा छलक।"

(लगातार)

संजय कुमार शर्मा